Tuesday, 17 January 2012
यादों के झरोखे से...
आज सुबह सुबह सुबह अपनी एक पुरानी डायरी देखी। समय उस वक्त कुछ 4 बज रहे थे।
उसमें दबे कुछ बहुत पुराने फुलों को देखा, चंद हसते खिलखिलाते शब्द दिखे ,जो
उस वक्त की फिर याद ताजा कर गये , दरअसल लम्हे ठहर जाते हैं, अगर उनमें अपनापन
हो तो. और मेरे वो दिन वैसे ही थे, वो मेरे ही थे। दरअसल वो फुल मुझे मेरे कॉलेज के कुछ
दोस्तों ने दिये थे, पिछले साल वेलेंटाइन डे पर। मेरे कुछ सीनियर जिन्होंने
कॉलेज लाइफ को एन्जॉय करने में मेरी मदद की, और हमेशा अपने नोट्स देकर
मुझे कम से कम पास होने लायक बनाया। कुछ लोग जो ऐसे थे जो मेरी इच्छा के
चलते ही मुझे लाल की जगह पीला गुलाब दे गए, अपनी जिद पर हसी आती है अब। आज शिद्दत से उन लोगों की कमी
महसुस हो रही है। उन लोगों की आज ऑफिस के न्यूज रुम में बैठे बहुत याद आ
रही है,। यहां सपने तो है पर अपने कोसो दुर है। हसी तो है पर खुशी की तलाश
जारी है। यहा बहुत सी चीजे तो है, और बहुत से लोग भी, पर होता है ना जब हमें गुड़ की आवश्यकता होती है, तो मिठाई कुछ नहीं कर सकती।
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